बाट देखती रहती हैं बस,
देहरी पर दो बूढ़ी आँखे।
आएगें जब मिलने उनसे,
उनकी ही आँखो के तारे।
फुर्सत निकाल कर व्यस्त जीवन से,
माता-पिता पर स्नेह लुटाने।
एक बार आते हैं फिर वो,
कितने हैं एहसान गिनाते।
भूल जाते हैं कि कैसे
माता-पिता ने भी
आँखो में है काटी रातें।
अब वो आँखे हो गई बूढ़ी,
तकते तकते राह भी उनकी।
बाट देखती रहती हैं बस,
देहरी पर दो बूढ़ी आँखे।
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न रोको मुझको उड़ने दो

सरिता सेठी
हाँ, मैं हूँ उड़ने को तैयार,
खुले आसमान में अपने पंख पसार।
न रोको मुझको उड़ने दो,
नील गगन छू लेने दो।
न लगाओ पहरे हजार,
दे कर देखो मौका एक बार।
मुझमें हैं वो सारी क्षमताएं,
खुद ही कर लूंगी दूर बाधाएं।
देखो तो कर के विश्वास,
दिखा दूंगी मैं हूँ कुछ खास।
न रोको मुझको उड़ने दो,
नील गगन छू लेने दो।
(एक बेटी की चाह)
मेरी बेटी, मेरी माॅडर्न माँ

सरिता सेठी
जी हाँ, मेरे पास है एक मॉडर्न माँ।
जिसे पंख दिए हैं मैंने,
वो मुझे उड़ना सिखा रही है।
सूट साड़ी के साथ साथ ,
अब जींस भी पहना रही है।
शापिंग करती थी बाज़ार से,
अनलाइन शापिंग सिखा रही है।
परिस्थितियां सुलझाती थी अपने ढंग से,
उन्हें सुलझाने के माॅडर्न तरीके सिखा रही है।
लेखन कही छूट गया था पीछे
उस शौक को फिर से जगा रही है।
जिसे पंख दिए हैं मैंने,
वो मुझे उड़ना सिखा रही है।
सागर
इस कविता की रचना आज से लगभग पच्चीस वर्ष पूर्व की गई थी।अपने जीवन साथी को
अपने नाम के अनुरूप ही अपनी कल्पना में “सागर” नाम दिया था।
– सरिता सेठी
अगर मैं सरिता हूँ
तो तुम एक सागर हो
सागर से मिलकर
सरिता का आस्तित्व समाप्त हो जाता है
लेकिन मैं चाहती हूँ कि
इस सरिता का सागर ऐसा हो
जो कि सरिता का आस्तित्व मिटने न दे
उसकी एक अलग पहचान बनाए रखे
तुम सरिता को उसके वास्तविक रूप में ही ग्रहण कर लो
तो सरिता भी सागर में पूर्णतया विलीन हो जाएगी
फिर कोई नहीं जान पाएगा कि
अशुद्धिया सरिता की है या सागर की
दोनो मिलकर
एक दूसरे की अशुद्धियों को दूर कर
एक ऐसा वातावरण तैयार करें कि
इस सरिता सागर का मिलन
दुनियां में एक मिसाल बन जाए।
जीवन की रेसिपी
– सरिता सेठी
बचपन एक खाली बर्तन सा,
मध्यम आंच पर इसे तपाया,
फिर डाला इसमें स्नेह का घी,
प्रेम का इसमें तङका लगाया,
इस तङके को खूब पकाया,
आचार व्यवहार का डाला मसाला,
धीमी आंच पर इसे पकाया,
इसमें डाली कर्तव्यो की तरकारी
कर्तव्यो को भी खूब पकाया,
धीरे धीरे कर्तव्यो को,
स्वार्थ की कलछी से भी हिलाया,
कर्तव्यो को सहेजने की खातिर
अधिकारों का भी छींटा लगाया,
फिर कर्तव्यो को और पकाया,
सारी उलझनों को आचरण के
ढक्कन से ढक कर,
खूब पकाया खूब पकाया,
जीवन का एक अहम् हिस्सा,
खर्च किया इस तरकारी को पकाने में,
लो बन कर तैयार हो गई,
सुखी और खुशहाल रेसिपी।
मेरी चाह
– सरिता सेठी
जी चाहता है छू लूं आसमान
उङ कर देख लूं सारा जहान
रंग बिरंगी तितलियों के संग उङू
कलरव करते पंछियों के संग उङू
पेड़ो की शाखों पर उठती फिरूँ
हर पल दुनिया का बदलता रूप देखूं
देखूं कि सूरज कैसे उगता है
देखूं कि दिन भर चांद क्या करता है
इस दुनियां में कोई भी प्राणी कष्ट न पाए
सब हँसते खिलखिलाते रहे, कुछ ऐसा हो जाए
न हो घर की फिक्र न बाहर की चिंता
सब मिल कर रहें बस यही एक तमन्ना
न जान पाऊँ कि किसके मन में है क्या
सबके साथ एक सा व्यवहार करने की हो कला
जीवन के हर रूप को पहचानने का ख्वाब नहीं
सब सुखी स्वस्थ और साथ रहें, इसके अतिरिक्त कोई चाह नहीं।

कैद है तू अपनी ही सोच की बेङियो में
– सरिता सेठी
कैद है तू अपनी ही सोच की बेङियो में
नारी तू तो सरिता है
क्या सरिता को भी कोई बांध पाया है
सरिता का शांत रूप देखा है सभी ने
जबकि उसमें समाया है अनन्त तूफान
सरिता जहाँ शांत रूप से बहती है
उसकी राह बदलता जमाना है
लेकिन जब अपने रौद्र रूप में आती है
तो कोई नहीं रोक पाता है
शांत रूप में बहते बहते
सभी उथल पुथल को सहते सहते
कैद हो गई है तू अपनी ही सोच की बेङियो में
तुझे नहीं मचाना है कोई शोर
अपनी इस अवस्था का नहीं ढूढना कोई ओर छोर
तुझे तो केवल अपनी इस सुप्तावस्था को जगाना है
अपने आस्तित्व को सही राह दिखाना है
तुझे नहीं बनना है कोई तूफान
नहीं है इसमें तेरी कोई शान
तुझे तो केवल स्वाभिमान से चलना है
अपनी राह की बेङियो को हटाना है
अपने इर्द गिर्द जो जमी गहरी काई है
जिसमें छिप गया है तेरा स्वाभिमान
इस काई को खुरचना है बस
अपने भीतर जलाना है एक ऐसा दीपक
तूफानों से भी जो टकरा जाए
तो तेरा स्वाभिमान रूपी तेल उस दीपक को बुझने न दे
इसके लिए जरूरी है कि खुद को न मिटा
अपनी अलग एक पहचान बना
फिर कोई नहीं बांध पाएगा तुझे
तेरा स्वतंत्र होना आवश्यक है
विचारों की उथल पुथल आवश्यक है
विचारों की उथल पुथल तुझमे शुद्धता लाऐगी
फिर सम्पूर्ण सृष्टि तेरे वास्तविक रूप को देख पाएगी
निकल, मत उलझ संसार की अठखेलियो में
क्योंकि कैद है तू अपनी ही सोच की बेङियो में।

