मेरी बेटी, मेरी माॅडर्न माँ

सरिता सेठी

जी हाँ, मेरे पास है एक मॉडर्न माँ।
जिसे पंख दिए हैं मैंने,
वो मुझे उड़ना सिखा रही है।
सूट साड़ी के साथ साथ ,
अब जींस भी पहना रही है।
शापिंग करती थी बाज़ार से,
अनलाइन शापिंग सिखा रही है।
परिस्थितियां सुलझाती थी अपने ढंग से,
उन्हें सुलझाने के माॅडर्न तरीके सिखा रही है।
लेखन कही छूट गया था पीछे
उस शौक को फिर से जगा रही है।
जिसे पंख दिए हैं मैंने,
वो मुझे उड़ना सिखा रही है।

सागर

इस कविता की रचना आज से लगभग पच्चीस वर्ष पूर्व की गई थी।अपने जीवन साथी को
अपने नाम के अनुरूप ही अपनी कल्पना में “सागर” नाम दिया था।

– सरिता सेठी

अगर मैं सरिता हूँ
तो तुम एक सागर हो
सागर से मिलकर
सरिता का आस्तित्व समाप्त हो जाता है
लेकिन मैं चाहती हूँ कि
इस सरिता का सागर ऐसा हो
जो कि सरिता का आस्तित्व मिटने न दे
उसकी एक अलग पहचान बनाए रखे
तुम सरिता को उसके वास्तविक रूप में ही ग्रहण कर लो
तो सरिता भी सागर में पूर्णतया विलीन हो जाएगी
फिर कोई नहीं जान पाएगा कि
अशुद्धिया सरिता की है या सागर की
दोनो मिलकर
एक दूसरे की अशुद्धियों को दूर कर
एक ऐसा वातावरण तैयार करें कि
इस सरिता सागर का मिलन
दुनियां में एक मिसाल बन जाए।

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