मेरा वजूद माँग रहा हिसाब

सरिता सेठी

मेरे वजूद ने मुझे नींद से जगाया
और मुझसे पूछा एक सवाल,
करती रही तुम सबका ख्याल,
मेरा भी कर दो ज़रा आज हिसाब।
बहुत सोचा पर जवाब न सूझा
फिर तुनक कर बोला मैंने,
हो तो तुम मेरा ही हिस्सा,
फिर क्यों मांगो मुझसे हिसाब?
मेरा जीवन एक खुली किताब,
सादगी से जिया इसे मैंने,
अपने वजूद को तो बिल्कुल न छुआ है मैंने।
थाम कर चली सदा रिश्तों की डोर,
इन सब के सामने नही तेरा कोई ओर छोर।
फिर क्यों कर तुमको मैं देखूँ,
और क्यों कर तुमको मैं समझूँ।
फिर से बोला मेरा वजूद,
नजर अंदाज़ न करना मुझको
चाहे मैं हूँ तुम्हारे ही भीतर
मेरी अवहेलना कर के तुम
कर बैठोगी अन्याय
बाकी सभी रिश्तों से भी
मैं तो स्वाभिमान तुम्हारा,
क्या जी पाओगी मुझ बिन।
खुद को समझो,वजूद को समझो
नहीं तो खो जाओगी एक दिन
इस दुनिया की भीड़ भाड़ में
न फिर ढूँढ पाओगी खुद को,
स्वार्थ भरी इस दुनिया में।
समझ जाओ अब,
संभल जाओ अब
ढूँढ लाओ अब अपना वजूद।
मेरा वजूद माँग रहा हिसाब।
मेरा वजूद माँग रहा हिसाब।

अभिव्यक्ति – सोच का सैलाब

हिन्दी और माँ

सरिता सेठी

हिन्दी की स्थिति बिल्कुल माँ जैसी है। माँ जिस प्रकार बच्चे को पाल पोस कर बढ़ाया करती है। ठीक उसी प्रकार हिन्दी भाषा ने भी हम सब का पोषण किया है। बच्चा बड़ा होकर अंग्रेजी विद्यालय जाता है और अपनी मातृभाषा से नज़रें चुराने लगता है। बड़ा होने पर एक दिन अंग्रेजी दुल्हन घर ले आता है। जैसे माँ विदेशी बहु को अपना लेती है उसी प्रकार हिन्दी भाषा भी अंग्रेजी के शब्दों को आत्मसात कर लेती है। बेटा धीरे धीरे अंग्रेजी दुल्हन में रम जाता है और माँ को भूलने लगता है। अब तो माँ की उपस्थिति केवल तीज-त्यौहार पर ही होती है। हमारी मातृभाषा हिन्दी का हाल भी माँ जैसा है। हम केवल विशेष अवसरों पर ही हिन्दी को याद करते हैं। परन्तु माँ तो माँ होती है। हम कितना भी उसे तिरस्कृत करें वो अपना प्यार और वात्सल्य सदा अपने बच्चों पर ही लुटाती है।

आओ आज ये प्रण लें कि हिन्दी और माँ दोनों का सम्मान करेंगे।दोनो में से किसी को भी अपमानित नहीं होने देंगे।

दिल से करें हिन्दी का सम्मान

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सागर

इस कविता की रचना आज से लगभग पच्चीस वर्ष पूर्व की गई थी।अपने जीवन साथी को
अपने नाम के अनुरूप ही अपनी कल्पना में “सागर” नाम दिया था।

– सरिता सेठी

अगर मैं सरिता हूँ
तो तुम एक सागर हो
सागर से मिलकर
सरिता का आस्तित्व समाप्त हो जाता है
लेकिन मैं चाहती हूँ कि
इस सरिता का सागर ऐसा हो
जो कि सरिता का आस्तित्व मिटने न दे
उसकी एक अलग पहचान बनाए रखे
तुम सरिता को उसके वास्तविक रूप में ही ग्रहण कर लो
तो सरिता भी सागर में पूर्णतया विलीन हो जाएगी
फिर कोई नहीं जान पाएगा कि
अशुद्धिया सरिता की है या सागर की
दोनो मिलकर
एक दूसरे की अशुद्धियों को दूर कर
एक ऐसा वातावरण तैयार करें कि
इस सरिता सागर का मिलन
दुनियां में एक मिसाल बन जाए।

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