दिल से करें हिन्दी का सम्मान

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मेरी चाह

– सरिता सेठी

जी चाहता है छू लूं आसमान
उङ कर देख लूं सारा जहान
रंग बिरंगी तितलियों के संग उङू
कलरव करते पंछियों के संग उङू
पेड़ो की शाखों पर उठती फिरूँ
हर पल दुनिया का बदलता रूप देखूं
देखूं कि सूरज कैसे उगता है
देखूं कि दिन भर चांद क्या करता है
इस दुनियां में कोई भी प्राणी कष्ट न पाए
सब हँसते खिलखिलाते रहे, कुछ ऐसा हो जाए
न हो घर की फिक्र न बाहर की चिंता
सब मिल कर रहें बस यही एक तमन्ना
न जान पाऊँ कि किसके मन में है क्या
सबके साथ एक सा व्यवहार करने की हो कला
जीवन के हर रूप को पहचानने का ख्वाब नहीं
सब सुखी स्वस्थ और साथ रहें, इसके अतिरिक्त कोई चाह नहीं।



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