
आओ मिलकर करें ये संकल्प,
अपने मन के भीतर के रावण का करें अन्त।
हारेंगी सभी बुराइयाँ तभी,
होगा आगाज़ एक नई सुबह का
जिसका करते रहे सदा इंतज़ार
फिर न किसी की विजय होगी,
न होगी किसी की हार।
हर दिन ही होगा एक त्योहार।

आओ मिलकर करें ये संकल्प,
अपने मन के भीतर के रावण का करें अन्त।
हारेंगी सभी बुराइयाँ तभी,
होगा आगाज़ एक नई सुबह का
जिसका करते रहे सदा इंतज़ार
फिर न किसी की विजय होगी,
न होगी किसी की हार।
हर दिन ही होगा एक त्योहार।

सरिता सेठी
जीवन है एक मेला,
हर शख्स है जिसमें अकेला।
चारों तरफ नज़रें आते हैं इन्सान,
पर सभी लगते हैं अन्जान।
पहचान है तो केवल स्वार्थ से,
दोस्ती है तो स्वार्थ से,
स्वार्थों की पूर्ति करते करते,
व्यक्ति की आँखों से है वो चश्मा गिर चुका है।
जिसमें नज़र आती है इन्सानियत,
जिसमें नज़र आते हैं इन्सानी रिश्ते।
इन्सानियत को जिन्दा रखना है तो,
स्वार्थ को मिटाना होगा,
रिश्तों को बचाना होगा।
फिर जीवन बन जाएगा ऐसा मेला,
जिसमें रहेगा न तू अकेला
– सरिता सेठी
जी चाहता है छू लूं आसमान
उङ कर देख लूं सारा जहान
रंग बिरंगी तितलियों के संग उङू
कलरव करते पंछियों के संग उङू
पेड़ो की शाखों पर उठती फिरूँ
हर पल दुनिया का बदलता रूप देखूं
देखूं कि सूरज कैसे उगता है
देखूं कि दिन भर चांद क्या करता है
इस दुनियां में कोई भी प्राणी कष्ट न पाए
सब हँसते खिलखिलाते रहे, कुछ ऐसा हो जाए
न हो घर की फिक्र न बाहर की चिंता
सब मिल कर रहें बस यही एक तमन्ना
न जान पाऊँ कि किसके मन में है क्या
सबके साथ एक सा व्यवहार करने की हो कला
जीवन के हर रूप को पहचानने का ख्वाब नहीं
सब सुखी स्वस्थ और साथ रहें, इसके अतिरिक्त कोई चाह नहीं।
