
सरिता सेठी
ऐ जिन्दगी
बहुत करीब से देखा है तुझे,
तेरा इतराना तेरा इठलाना,
तेरा पल पल नाराज़ हो जाना,
तेरा रूठना और तेरा ही मनाना,
कभी पतझड़ की तरह चरमराना,
तो कभी वसन्त सा महकना।o
तेरे सभी रूपों से हो गए वाकिफ़,
तेरे सभी रंगों से सरोबार।

सरिता सेठी
ऐ जिन्दगी
बहुत करीब से देखा है तुझे,
तेरा इतराना तेरा इठलाना,
तेरा पल पल नाराज़ हो जाना,
तेरा रूठना और तेरा ही मनाना,
कभी पतझड़ की तरह चरमराना,
तो कभी वसन्त सा महकना।o
तेरे सभी रूपों से हो गए वाकिफ़,
तेरे सभी रंगों से सरोबार।

सरिता सेठी
जीवन है एक मेला,
हर शख्स है जिसमें अकेला।
चारों तरफ नज़रें आते हैं इन्सान,
पर सभी लगते हैं अन्जान।
पहचान है तो केवल स्वार्थ से,
दोस्ती है तो स्वार्थ से,
स्वार्थों की पूर्ति करते करते,
व्यक्ति की आँखों से है वो चश्मा गिर चुका है।
जिसमें नज़र आती है इन्सानियत,
जिसमें नज़र आते हैं इन्सानी रिश्ते।
इन्सानियत को जिन्दा रखना है तो,
स्वार्थ को मिटाना होगा,
रिश्तों को बचाना होगा।
फिर जीवन बन जाएगा ऐसा मेला,
जिसमें रहेगा न तू अकेला

ऐसा कई बार हुआ है,
अपनी ही वाणी को विराम दिया है।
रिश्तों को सहेजने की खातिर,
खामोशी को भी इम्तिहान दिया है।
मन में दबा कर मन के उदगारों को,
सहनशीलता का ईनाम लिया है।
दबती रही मन में उदगारों की चिंगारी, और
हमने इस चिंगारी को दफनाने का काम किया है।
दिन रात करती हूँ सवाल ये स्वयं से,
क्या मैंने बहुत अच्छा काम किया है?
मिला न उत्तर मुझे मेरे ही प्रश्न का,
आखिर क्यों अपनी वाणी को ही विराम दिया है।
बन गई है अब तो यह आदत अपनी,
इस आदत को सींचने का काम तो मैंने खुद ही किया है।
रिश्तों को सहेजने की खातिर,
खामोशी को भी इम्तिहान दिया है।
सरिता सेठी
– सरिता सेठी
बचपन एक खाली बर्तन सा,
मध्यम आंच पर इसे तपाया,
फिर डाला इसमें स्नेह का घी,
प्रेम का इसमें तङका लगाया,
इस तङके को खूब पकाया,
आचार व्यवहार का डाला मसाला,
धीमी आंच पर इसे पकाया,
इसमें डाली कर्तव्यो की तरकारी
कर्तव्यो को भी खूब पकाया,
धीरे धीरे कर्तव्यो को,
स्वार्थ की कलछी से भी हिलाया,
कर्तव्यो को सहेजने की खातिर
अधिकारों का भी छींटा लगाया,
फिर कर्तव्यो को और पकाया,
सारी उलझनों को आचरण के
ढक्कन से ढक कर,
खूब पकाया खूब पकाया,
जीवन का एक अहम् हिस्सा,
खर्च किया इस तरकारी को पकाने में,
लो बन कर तैयार हो गई,
सुखी और खुशहाल रेसिपी।