मैं ‘ को भी ले चलूंगी साथ

सरिता सेठी

एक दिन बैठ कर सोचा मैंने
क्या कुछ पाया ‘मैं ‘को खो कर,
घर पाया, परिवार भी पाया,
आदर और सम्मान भी पाया।
इतना सब कुछ मैंने पाया,
फिर क्यों ये प्रश्न दिल ने उठाया।
भागता रहा जीवन रेल की भाँति,
सीधी और सपाट पटरी पर।
उम्र का हर स्टेशन आया,
पर ‘मैं ‘तो कहीं भी चढ़ न पाया।
निकल गए अब बहुत से स्टेशन,
‘मैं ‘ तो कहीं भी नज़र न आया।
कैसे अब पहचानू ‘मैं ‘को,
आँखो पर भी चश्मा चढ़ आया।
ठान लिया है अब तो मैंने,
इस स्टेशन पर न चूकूंगी,
‘ मैं ‘को भी मैं साथ में लूंगी।
आखिर ये आस्तित्व है मेरा,
छोड़ दूं कैसे वजूद ही मेरा।
घर और परिवार का थामे हाथ,
‘मैं ‘ को भी ले चलूंगी साथ।

दिल से करें हिन्दी का सम्मान

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अनसुलझी पहेली

-सरिता सेठी

जीवन है एक पहेली सा,
एक अनसुलझी पहेली सा,
सारा जीवन लगा दांव पर,
इस पहेली को सुलझाने में,
सारे जग के नाते निभाने में,
न जाने फिर क्यों न सुलझे,
ये अनसुलझी पहेली सा,
हर दौर से जीवन गुजरे,
अच्छा और बुरा भी गुजरे,
दिन रात एक किए बहुतेरे,
फिर भी न सुलझे ये पहेली,
अब तो लगे ये सखी सहेली,
क्यों न इसके साथ ही जी लें
इस उधङन को समझ से सी लें
फिर न लगेगा जीवन पहेली,
बन जाएगा सखी सहेली,
सारे दर्द अब सांझा होंगे,
सारे राज़ उजागर होंगे,
अनसुलझी फिर रहे न पहेली,
जीवन बन जाए जब सखी सहेली,
आओ इसे अब प्यार से भर दें,
च॔चलता से दामन भर दें,
तब न रहेगा जीवन पहेली
सुलझ जाएगी सभी पहेली

माँ जैसी हो गई हूँ

-सरिता सेठी

नीलू बहुत ही अल्हड़ लङकी थी। हमेशा मस्त रहने वाली। एक भरे पूरे परिवार में रहती थी। एकदम मस्त और बिंदास। भाई बहनों में सबसे छोटी होने के कारण सबकी लाडली बन गई थी। अपनी माँ को हर पल काम करते देखती। माँ उसे समय समय पर सीख देती रहती। वो अल्हड़ लङकी कुछ सुनती कुछ अनसुना कर देती। समय पंख लगा कर उड़ता रहा।समय बदला, अब नीलू खुद भी दो बच्चों की माँ है। माँ ने भी गृहस्थी चलाने में पूरा सहयोग दिया। आज माँ साथ नहीं है, परन्तु माँ की हर बात उसे याद है। माँ की कही अनकही सभी बातें याद हैं।मजे की बात तो यह है कि माँ की जो बातें बेकार और बेमानी लगती थी, अब वो सब अर्थपूर्ण हो गई हैं। माँ की जो आदतें नापसंद थी, आज वही आदतें अपने में महसूस करने लगी है। आज हर बात पर माँ का ही किस्सा याद आता है। जिन आदतों पर नाक चिड़ाती थी, न जाने कब उसमें खुद में ही उजागर होने लगी। अब उसे ये अहसास हो गया है कि वो तो बिल्कुल अपनी माँ जैसी हो गई है।
क्या आपको भी ऐसा महसूस होता है?
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कुछ लिखने से पहले भी कुछ सोचना पड़ता है

-सरिता सेठी

कुछ सोचने से पहले भी कुछ सोचना पड़ता है।
कुछ लिखने से पहले भी कुछ सोचना पड़ता है।
कहने को कितनी आधारहीन है ये बात,
परन्तु बहुत गहराई से सोचने वाली है ये बात।
क्या सदा हम बोल पाते हैं बिना सोचे,
क्या अपने मन की उथल पुथल को व्यक्त कर पाते हैं बिना सोचे,
हाँ, बिल्कुल कर सकते हैं क्योंकि,
हमें मिला है अधिकार अभिव्यक्ति का,
हमें मिली है आजादी, भावनाओं को व्यक्त करने की,
तो क्या हुआ जो हमें सोचना पड़ता है कुछ कहने से पहले,
तो क्या हुआ कथन का प्रभाव सोचना पड़ता है कुछ कहने से पहले,
तो क्या हुआ जो सभी का ख्याल कर चुप रहना पड़ता है कुछ कहने से पहले,
तो क्या हुआ जो अपनी ही आवाज का गला दबाना पड़ता है कुछ कहने से पहले,
फिर भी तुम कहते हो कि अभिव्यक्ति की आजादी है,
विचारों को भावों को प्रकट करने की आजादी है,
फिर तो बहुत ही दम घोंटने वाली है ये आजादी,
धुएं से भरे कमरे में खुल कर साँस लेने वाली है ये आजादी,
नहीं चाहिए ऐसी आजादी,
जिसमें एहसास भी न हो आजादी का,
जो आजादी तुम्हें अनदेखी जंजीरों में जकड़े,
सारी जिंदगी केवल झूठे दिखावो में निकले,
कि तुम आजाद हो,
लेकिन यह क्या,
ये सोचने का तो अधिकार ही नहीं है मुझे,
समाज ने औरत को ये अधिकार तो दिए ही नहीं,
लेखन का अधिकार तो छीना है समाज से,
क्या पता ये लेखन डायरी तक ही सीमित होगा या
इसे भी अधिकार मिलेगा प्रकाशन का,
क्योंकि मैं तो भूल ही गई थी कि
कुछ लिखने से पहले भी कुछ सोचना पड़ता है।
लिखने के बाद सोचती हूँ कि
कि कहीं मेरी पंक्तियाँ ह्रदय छलनी न कर दे
समाज के ठेकेदारों का,
मेरा यह विचार मजबूर न कर दे उन्हें,
मुझे कटघरे में खड़ा करने को,
तभी तो कहती हूँ कि
कुछ लिखने से पहले भी कुछ सोचना पड़ता है।



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