सपनों की फसल

सावन आता है
तो बहुत से सपने भी साथ लाता है।
बोए जाते है सपनों के बीज,
गीली मिट्टी में।
इस तरह कई सावन आते और जाते हैं,
हर सावन में केवल सपने बोए जाते हैं।
आशा की उपजाऊ भूमि पर ही
फिर एक दिन फूटता है अंकुर सपनों का,
और फलता फूलता है सपना
परिश्रम की सिंचाई रंग लाती है
और सपनों को एक ऊँची उड़ान दे जाती है।

अभिव्यक्ति – सोच का सैलाब

सरिता सेठी

बूढ़ी आँखे

बाट देखती रहती हैं बस,
देहरी पर दो बूढ़ी आँखे।
आएगें जब मिलने उनसे,
उनकी ही आँखो के तारे।
फुर्सत निकाल कर व्यस्त जीवन से,
माता-पिता पर स्नेह लुटाने।
एक बार आते हैं फिर वो,
कितने हैं एहसान गिनाते।
भूल जाते हैं कि कैसे
माता-पिता ने भी
आँखो में है काटी रातें।
अब वो आँखे हो गई बूढ़ी,
तकते तकते राह भी उनकी।
बाट देखती रहती हैं बस,
देहरी पर दो बूढ़ी आँखे।

ऐ जिन्दगी

सरिता सेठी

ऐ जिन्दगी
बहुत करीब से देखा है तुझे,
तेरा इतराना तेरा इठलाना,
तेरा पल पल नाराज़ हो जाना,
तेरा रूठना और तेरा ही मनाना,
कभी पतझड़ की तरह चरमराना,
तो कभी वसन्त सा महकना।o
तेरे सभी रूपों से हो गए वाकिफ़,
तेरे सभी रंगों से सरोबार।

मैं ‘ को भी ले चलूंगी साथ

सरिता सेठी

एक दिन बैठ कर सोचा मैंने
क्या कुछ पाया ‘मैं ‘को खो कर,
घर पाया, परिवार भी पाया,
आदर और सम्मान भी पाया।
इतना सब कुछ मैंने पाया,
फिर क्यों ये प्रश्न दिल ने उठाया।
भागता रहा जीवन रेल की भाँति,
सीधी और सपाट पटरी पर।
उम्र का हर स्टेशन आया,
पर ‘मैं ‘तो कहीं भी चढ़ न पाया।
निकल गए अब बहुत से स्टेशन,
‘मैं ‘ तो कहीं भी नज़र न आया।
कैसे अब पहचानू ‘मैं ‘को,
आँखो पर भी चश्मा चढ़ आया।
ठान लिया है अब तो मैंने,
इस स्टेशन पर न चूकूंगी,
‘ मैं ‘को भी मैं साथ में लूंगी।
आखिर ये आस्तित्व है मेरा,
छोड़ दूं कैसे वजूद ही मेरा।
घर और परिवार का थामे हाथ,
‘मैं ‘ को भी ले चलूंगी साथ।

दर्जा है तुम्हारा खास #ऊषा दी #श्रद्धांजलि

                                                                                                                            सरिता सेठी 

हर पल रूप बदलती इस दुनिया में,
कोई न कोई होता है बहुत खास,
उसका एहसास सदा होता है तुम्हारे पास
जो सदा ही करता है तुम्हें प्रेरित
सिखाता है तुम्हें जीवन की रीत
मेरे जीवन में भी है वो खास व्यक्तित्व
वो है मेरी बड़ी बहन ऊषा
नहीं है आज वो हम सब के बीच
लेकिन उसका एहसास है सदा दिलों के बीच
ऊषा की किरणों की भाँति उसका आस्तित्व
रोशन करता है आज भी हमारे जीवन को
दूर कर देता है सभी अंधकारो को
हम सब के जीवन को तुमने ऐसे महकाया
जीवन जीने का अंदाज भी सिखाया
अपने नाम के अनुरूप ही शीतलता का कराया सदा एहसास
तभी तो हमारे जीवन में दर्जा है तुम्हारा खास। 🙏🙏🙏

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जीवन का मेला

सरिता सेठी

जीवन है एक मेला,
हर शख्स है जिसमें अकेला।
चारों तरफ नज़रें आते हैं इन्सान,
पर सभी लगते हैं अन्जान।
पहचान है तो केवल स्वार्थ से,
दोस्ती है तो स्वार्थ से,
स्वार्थों की पूर्ति करते करते,
व्यक्ति की आँखों से है वो चश्मा गिर चुका है।
जिसमें नज़र आती है इन्सानियत,
जिसमें नज़र आते हैं इन्सानी रिश्ते।
इन्सानियत को जिन्दा रखना है तो,
स्वार्थ को मिटाना होगा,
रिश्तों को बचाना होगा।
फिर जीवन बन जाएगा ऐसा मेला,
जिसमें रहेगा न तू अकेला

हिन्दी और माँ

सरिता सेठी

हिन्दी की स्थिति बिल्कुल माँ जैसी है। माँ जिस प्रकार बच्चे को पाल पोस कर बढ़ाया करती है। ठीक उसी प्रकार हिन्दी भाषा ने भी हम सब का पोषण किया है। बच्चा बड़ा होकर अंग्रेजी विद्यालय जाता है और अपनी मातृभाषा से नज़रें चुराने लगता है। बड़ा होने पर एक दिन अंग्रेजी दुल्हन घर ले आता है। जैसे माँ विदेशी बहु को अपना लेती है उसी प्रकार हिन्दी भाषा भी अंग्रेजी के शब्दों को आत्मसात कर लेती है। बेटा धीरे धीरे अंग्रेजी दुल्हन में रम जाता है और माँ को भूलने लगता है। अब तो माँ की उपस्थिति केवल तीज-त्यौहार पर ही होती है। हमारी मातृभाषा हिन्दी का हाल भी माँ जैसा है। हम केवल विशेष अवसरों पर ही हिन्दी को याद करते हैं। परन्तु माँ तो माँ होती है। हम कितना भी उसे तिरस्कृत करें वो अपना प्यार और वात्सल्य सदा अपने बच्चों पर ही लुटाती है।

आओ आज ये प्रण लें कि हिन्दी और माँ दोनों का सम्मान करेंगे।दोनो में से किसी को भी अपमानित नहीं होने देंगे।

दिल से करें हिन्दी का सम्मान

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जीवन की रेसिपी

– सरिता सेठी

बचपन एक खाली बर्तन सा,
मध्यम आंच पर इसे तपाया,
फिर डाला इसमें स्नेह का घी,
प्रेम का इसमें तङका लगाया,
इस तङके को खूब पकाया,
आचार व्यवहार का डाला मसाला,
धीमी आंच पर इसे पकाया,
इसमें डाली कर्तव्यो की तरकारी
कर्तव्यो को भी खूब पकाया,
धीरे धीरे कर्तव्यो को,
स्वार्थ की कलछी से भी हिलाया,
कर्तव्यो को सहेजने की खातिर
अधिकारों का भी छींटा लगाया,
फिर कर्तव्यो को और पकाया,
सारी उलझनों को आचरण के
ढक्कन से ढक कर,
खूब पकाया खूब पकाया,
जीवन का एक अहम् हिस्सा,
खर्च किया इस तरकारी को पकाने में,
लो बन कर तैयार हो गई,
सुखी और खुशहाल रेसिपी।

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